डीडीए की गलती की वजह से यह हादसा हुआ है : डॉ.एस.सी.एल.गुप्ता
बुधवार जून 15, 2011 03:12 PM IST
दिल्ली के संगम विहार में बीती रात आई आंधी और बारिश का क़हर एक परिवार पर टूटा। आंधी की वजह से एक सूखा पेड़ गिर गया जिसमें एक बच्चे की दब कर मौत हो गई और दो बच्चे घायल हो गए। दरअसल, चंदन अपने दोस्तों के साथ खेल रहा था तभी उस पर पेड़ गिर पड़ा। बच्चों को बचाने के लिए लोग आनन−फानन में पहुंचे और पेड़ को हटाया। लेकिन चंदन की मौत मौके पर ही हो गई। बाकी दो घायल बच्चों को पास के अस्पताल में भर्ती कराया गया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि डीडीए की गलती की वजह से यह हादसा हुआ है। लोगों के मुताबिक डीडीए को सूखे पेड़ों की कटाई करवानी चाहिए।
संगम विहार में पानी की समस्या के खिलाफ रैली
संगम विहार में पानी की किल्लत
संगम विहार में पानी
लाने वाला ही आगामी विधानसभा चुनाव में इस क्षेत्र से चुनकर विधानसभा
पहुंचेगा।
करीब छह लाख की आबादी वाले इस क्षेत्र के निवासियों को पिछले 10 साल से
दिल्ली जलबोर्ड की सप्लाई का पानी पिलाने का सब्जबाग दिखा जा रहा है,
लेकिन अबतक पूरे इलाके में पानी की पाइपलाइन भी नहीं डाली गई है। करीब चार
वर्ष पहले पाइपलाइन डालने के काम का शुभारंभ भी किया गया था, लेकिन यह
नारियल फोड़ने से आगे नहीं बढ़ सका। इलाके में पानी की किल्लत का आलम यह है
लोग एक-दूसरे को पानी देते भी हैं तो अगले दिन लौटाने की शर्त पर। लोगों की
परेशानी का फायदा यहां टैंकर माफिया उठाते हैं, जो 1000-1500 रुपये प्रति
टैंकर की उगाही करते हैं। कहने के लिए तो इलाके में दिल्ली जलबोर्ड से पानी
के टैंकर भी उपलब्ध कराए गए हैं, लेकिन उनकी संख्या इतनी नहीं कि पूरे
इलाके की प्यास बुझाई जा सके। क्योंकि यहां मांग 120 टैंकर की है, जबकि
आपूर्ति एक दर्जन टैंकर की भी नहीं होती है।
कहां-कहां है ज्यादा परेशानी
जिन इलाकों में पानी की सबसे ज्यादा किल्लत है उनमें संगम विहार, देवली
गांव, जवाहर पार्क, शिव पार्क, दुग्गल कॉलोनी, राजू पार्क, कृष्णा पार्क,
बिहारी कॉलोनी, दुर्गा विहार, तिगड़ी विस्तार, खानपुर गांव समेत कई अन्य
इलाके शामिल हैं।
कहां से आना था पानी
इस इलाके पीने के पानी की आपूर्ति सोनिया विहार जल संयंत्र से की जानी
थी। तय समय (2005) से दो वर्ष की देरी से शुरू हुए इस संयंत्र के पानी से
महरौली व अंबेडकर नगर समेत अन्य इलाकों की प्यास तो बुझ रही है, लेकिन संगम
विहार में आजतक पानी की पाइप लाइन भी नहीं डाली गई। इलाके में पानी की
किल्लत को देखते हुए वर्ष 2005 में 59 नए व पुराने ट्यूबवेल को नए सिरे से
चलाने व 50 नए हैंड पंप लगाने की कवायद भी हुई थी, लेकिन गिरते जल स्तर को
देखते हुए इसे भी ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। अब यहां न तो ट्यूबवेल से
पर्याप्त पानी आ रहा है और न ही हैंड पंप से। सोनिया विहार जल संयंत्र का
पानी तो यहां के लोगों को मयस्सर ही नहीं है।
May 18, 2009, 02.44PM IST
राकेश, दिल्ली
rakeshbachwan@yahoo.co.in
मैं नई दिल्ली, संगम
विहार जे-फर्स्ट, हमदर्द नगर की समस्या से अवगत करना चाहता हूं। हमारे
यहां कुछ महीने पहले ही पानी के लिए सरकारी व्यवस्था की गई थी, जिससे हमें
सही पानी मिलता था। लेकिन, पिछले एक महीने से यहां पानी की भारी किल्लत हो
रही है। इसके असली कारण हैं पानी के प्राइवट सप्लाई वाले।
सरकारी
पानी सप्लाई से कुछ ही लोगों को पानी मिलता है, तो फिर फायदा क्या इसे
लगवाने का? हम तो प्राइवट व्यव्स्था पर पहले भी निर्भर थे और अब भी। इस वजह
से यहां लोगों को पानी की भयंकर किल्लत का सामना करना पड़ रहा है। यहां के
विधायक और प्रशासन से विनती है कि इस ओर ध्यान दें, ताकि पानी के लिए इस
सरकारी व्यवस्था का उचित प्रयोग जनता कर सके।
संगम विहार में पानी
लाने वाला ही आगामी विधानसभा चुनाव में इस क्षेत्र से चुनकर विधानसभा
पहुंचेगा।
करीब छह लाख की आबादी वाले इस क्षेत्र के निवासियों को पिछले 10 साल से
दिल्ली जलबोर्ड की सप्लाई का पानी पिलाने का सब्जबाग दिखा जा रहा है,
लेकिन अबतक पूरे इलाके में पानी की पाइपलाइन भी नहीं डाली गई है। करीब चार
वर्ष पहले पाइपलाइन डालने के काम का शुभारंभ भी किया गया था, लेकिन यह
नारियल फोड़ने से आगे नहीं बढ़ सका। इलाके में पानी की किल्लत का आलम यह है
लोग एक-दूसरे को पानी देते भी हैं तो अगले दिन लौटाने की शर्त पर। लोगों की
परेशानी का फायदा यहां टैंकर माफिया उठाते हैं, जो 1000-1500 रुपये प्रति
टैंकर की उगाही करते हैं। कहने के लिए तो इलाके में दिल्ली जलबोर्ड से पानी
के टैंकर भी उपलब्ध कराए गए हैं, लेकिन उनकी संख्या इतनी नहीं कि पूरे
इलाके की प्यास बुझाई जा सके। क्योंकि यहां मांग 120 टैंकर की है, जबकि
आपूर्ति एक दर्जन टैंकर की भी नहीं होती है।
कहां-कहां है ज्यादा परेशानी
जिन इलाकों में पानी की सबसे ज्यादा किल्लत है उनमें संगम विहार, देवली गांव, जवाहर पार्क, शिव पार्क, दुग्गल कॉलोनी, राजू पार्क, कृष्णा पार्क, बिहारी कॉलोनी, दुर्गा विहार, तिगड़ी विस्तार, खानपुर गांव समेत कई अन्य इलाके शामिल हैं।
कहां से आना था पानी
इस इलाके पीने के पानी की आपूर्ति सोनिया विहार जल संयंत्र से की जानी थी। तय समय (2005) से दो वर्ष की देरी से शुरू हुए इस संयंत्र के पानी से महरौली व अंबेडकर नगर समेत अन्य इलाकों की प्यास तो बुझ रही है, लेकिन संगम विहार में आजतक पानी की पाइप लाइन भी नहीं डाली गई। इलाके में पानी की किल्लत को देखते हुए वर्ष 2005 में 59 नए व पुराने ट्यूबवेल को नए सिरे से चलाने व 50 नए हैंड पंप लगाने की कवायद भी हुई थी, लेकिन गिरते जल स्तर को देखते हुए इसे भी ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। अब यहां न तो ट्यूबवेल से पर्याप्त पानी आ रहा है और न ही हैंड पंप से। सोनिया विहार जल संयंत्र का पानी तो यहां के लोगों को मयस्सर ही नहीं है।
कहां-कहां है ज्यादा परेशानी
जिन इलाकों में पानी की सबसे ज्यादा किल्लत है उनमें संगम विहार, देवली गांव, जवाहर पार्क, शिव पार्क, दुग्गल कॉलोनी, राजू पार्क, कृष्णा पार्क, बिहारी कॉलोनी, दुर्गा विहार, तिगड़ी विस्तार, खानपुर गांव समेत कई अन्य इलाके शामिल हैं।
कहां से आना था पानी
इस इलाके पीने के पानी की आपूर्ति सोनिया विहार जल संयंत्र से की जानी थी। तय समय (2005) से दो वर्ष की देरी से शुरू हुए इस संयंत्र के पानी से महरौली व अंबेडकर नगर समेत अन्य इलाकों की प्यास तो बुझ रही है, लेकिन संगम विहार में आजतक पानी की पाइप लाइन भी नहीं डाली गई। इलाके में पानी की किल्लत को देखते हुए वर्ष 2005 में 59 नए व पुराने ट्यूबवेल को नए सिरे से चलाने व 50 नए हैंड पंप लगाने की कवायद भी हुई थी, लेकिन गिरते जल स्तर को देखते हुए इसे भी ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। अब यहां न तो ट्यूबवेल से पर्याप्त पानी आ रहा है और न ही हैंड पंप से। सोनिया विहार जल संयंत्र का पानी तो यहां के लोगों को मयस्सर ही नहीं है।
कहां से आना था पानी
इस इलाके पीने के पानी की आपूर्ति सोनिया विहार जल संयंत्र से की जानी थी। तय समय (2005) से दो वर्ष की देरी से शुरू हुए इस संयंत्र के पानी से महरौली व अंबेडकर नगर समेत अन्य इलाकों की प्यास तो बुझ रही है, लेकिन संगम विहार में आजतक पानी की पाइप लाइन भी नहीं डाली गई। इलाके में पानी की किल्लत को देखते हुए वर्ष 2005 में 59 नए व पुराने ट्यूबवेल को नए सिरे से चलाने व 50 नए हैंड पंप लगाने की कवायद भी हुई थी, लेकिन गिरते जल स्तर को देखते हुए इसे भी ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। अब यहां न तो ट्यूबवेल से पर्याप्त पानी आ रहा है और न ही हैंड पंप से। सोनिया विहार जल संयंत्र का पानी तो यहां के लोगों को मयस्सर ही नहीं है।
इस इलाके पीने के पानी की आपूर्ति सोनिया विहार जल संयंत्र से की जानी थी। तय समय (2005) से दो वर्ष की देरी से शुरू हुए इस संयंत्र के पानी से महरौली व अंबेडकर नगर समेत अन्य इलाकों की प्यास तो बुझ रही है, लेकिन संगम विहार में आजतक पानी की पाइप लाइन भी नहीं डाली गई। इलाके में पानी की किल्लत को देखते हुए वर्ष 2005 में 59 नए व पुराने ट्यूबवेल को नए सिरे से चलाने व 50 नए हैंड पंप लगाने की कवायद भी हुई थी, लेकिन गिरते जल स्तर को देखते हुए इसे भी ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। अब यहां न तो ट्यूबवेल से पर्याप्त पानी आ रहा है और न ही हैंड पंप से। सोनिया विहार जल संयंत्र का पानी तो यहां के लोगों को मयस्सर ही नहीं है।
गार्मेंट फैक्ट्रियों के निशाने पर मेहनतकशों का मोहल्ला
देश की राजधानी दिल्ली में संगम विहार एक ऐसा इलाका है, जहां ओखला, तुगलकाबाद, नोएडा, गुड़गांव आदि इलाकों में काम करने वाली मजदूरों की बड़ी आबादी रहती है। मेहनतकशों के इस मोहल्ले की आबादी करीब चार लाख है, जिसका बहुलांश मजदूर है। यह इलाका महरौली और तुगलकाबाद के बीच में है। यहां से गुड़गांव,नोएडा और ओखला जाना बेहद आसान है, क्योंकि यह मेन रोड पर है। विश्व महाशक्ति की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहे हमारे देश की थोथी बयानबाजी को यह उसके ही घर में झूठ साबित करता है। यहां नगर निगम के पानी के टैंकर से पीने का पानी लेने के लिए लोग आए दिन बवाल करते रहते हैं। मोहल्ले की सड़कें ऐसी कि पैदल चलना भी मुश्किल। बारिश में समूचा इलाका ऐसा लगता है कि जैसे गंदा नाला उफन पड़ा हो।
कुल मिलाकर बुनियादी सुविधाओं से वंचितों का इलाका है संगम विहार। यहां रहने वाले ज्यादातर लोग बेहद गरीबी में अपनी जिंदगी बसर करते हैं। इस इलाके के मजदूरों के श्रम पर गार्मेंट कंपनियों की गिद्ध नजर है। चूंकि संगम विहार का इलाका, नोएडा, गुडगांव और ओखला की मुख्य सड़क पर स्थित है, इसलिए यह इन इलाकों की गार्मेंट कं पनियों के अनियमित कामों के लिए बहुत ही मुफीद जगह है।
गुडगांव की एक नामी गिरामी गार्मेंट कम्पनी के लिए पीस तैयार करने वाले ठेकेदार नूरी लखनऊ में मलीहाबाद के रहने वाले हैं। उनके साथ उनका छोटा भीई रफीक भी काम करता है। रफीक अभी 13 साल का ही है। नूरी के परिवार के पास जमीन का एक टुकड़ा भी नहीं है। इसलिए उनका परिवार धनी किसानों के खेतों पर काम करके किसी तरह अपना गुजारा करता है। नूरी 10 साल पहले ही ओखला आ गये थे। उन्होंने नोएडा और ओखला की गार्मेंट कम्पनियों में काम किया। साल भर नहीं होता था कि उन्हें गार्मेंट कम्पनी उन्हें सड़क पर फेंक देती थी। आजिज आकर उन्होंने संगम विहार में 1500 रुपये में दो छोटे-छोटे कमरे किराये पर लेकर गार्मेंट कम्पनियों के लिए खुद काम करना शुरू किया। एक साल हुआ जब उन्होंने अपने छोटे भाई रफीक को भी गांव से बुला लिया।
बाल श्रम के लिए लाखों रुपया डकारने वाले और जनता को गुमराह करने वाले एनजीओ (स्वयं सेवी संगठन) की कारस्तानी को नूरी बहुत अच्छी तरह समझता है। वह कहता है, 'बाल श्रम की जड़ में गरीबी है, जो परिवार वालों को अपने बच्चों से काम कराने पर मजबूर करती है। सरकार की ओर से चलने वाला बाल श्रम उन्मूलन अभियान, गरीब परिवारों की गरीबी को दूर करने के बजाय, बच्चों से उनका रोजगार ही छीन लेता है। नतीजतन आय का जरिया ही बंद हो जाता है और परिवार दाने-दाने को मोहताज हो जाता है। हमें ऐसे कानून से कोई फायदा नहीं है, अलबत्ता नुकसान ही है।’
इस इलाके में पचासों एनजीओ काम करते हैं। कुकुरमुत्तों की तरह उगे ये संगठन दरअसल उन्हीं पूंजीवादी सरमायेदारों के पैसे से काम करते हैं जो इन मजदूरों का शोषण करते हैं। ये संगठन इन लुटेरों के धन से जनता की गरीबी दूर करने का भ्रम पैदा करते हैं। हकीकत यह है कि वे अपनी झोली भरने मे लगे हुए हैं।
बहरहाल, दिल्ली की अधिकांश बड़ी गार्मेंट कम्पनियां, जो विदेशों से आर्डर लेकर उनको कपड़ा निर्यात करती हैं, संगम विहार में ठेकेदारों की छोटी-छोटी यूनिटों में कपड़ा तैयार करवाने का काम करवाती हैं। गार्मेंट कम्पनियां उन्हें एक सैंपल देती हैं, जिसके आधार पर ठेकेदार (मजदूर इन्हें फैब्रीकेटर कहते हैं) अपने मजदूरों के साथ पीस तैयार करता है। इस व्यवसाय से जुड़े ज्यादातर ठेकेदार भी नूरी की तरह ही हैं। ठेकेदारी का यह काम उनकी आजीविका का एक सहारा है। इन ठेकेदारों में से ज्यादातर उत्तर प्रदेश और बिहार के हैं। इसमें हर जाति और मजहब के लोग मिल जाएंगे। हालांकि सिलाई का काम करने वाले ठेकेदारों में सबसे ज्यादा संख्या उत्तर प्रदेश और विहार के ठेकेदारों की है। बड़ी कम्पनियों द्वारा कई बार इनका पेमेंट रोक देने से ये बर्बाद भी खूब होते हैं। यही वजह है कि इलाके में इनकी संख्या स्थिर नहीं रहती है। स्टिचिंग वर्क (सिलाई का काम) करने वाली ज्यादातर यूनिटों के मालिक (ठेकेदार) स्वयं भी अपने मजदूरों के साथ काम करते हं। इन ठेकेदारों में से 40 से 50 प्रतिशत ऐसे ठेकेदार हैं, जिन्होंने दिल्ली, नोएडा या फिर गुड़गाव की किसी फैक्ट्री में मजदूर के तौर पर काम किया है। इसलिए इन यूनिटों में मालिक-मजदूर का रिश्ता वैसा नहीं होता जैसा कि किसी बड़ी यूनिट में होता है। मजदूर और मालिक (ठेकेदारों) के बीच आपस में गाली-गलौज, हंसी-मजाक और यहां तक कि मारपीट भी बराबरी के स्तर पर ही होती है।
सिलाई के काम के अलावा संगम विहार का इलाका जरी या मोती सितारा के काम के लिए, एक मुख्य केन्द्र के रुप में भी जाना जाता है। यहां इस काम को करने वाले ज्यादातर लोग बरेली के रहने वाले हैं। बरेली में यह काम मुगलों के जमाने से होता आया है। इसलिए वहां के हुनरमंद मजदूर इस काम के लिए ज्यादा सही साबित होते हैं। बरेली का दिल्ली के करीब होना भी एक वजह है। संगम विहार में सिलाई के काम में जहां सबसे ज्यादा हिन्दू मजदूर हैं वहीं, मोती सितारा का काम करने वाले ज्यादातर मजदूर मुस्लिम हैं। ‘ संगम विहार में जरी के काम में लगे हुए करीब 70 प्रतिशत मजदूरों की उम्र 18 साल से कम है। करीब 60 प्रतिशत बाल मजदूर अभी 14 साल से कम के हैं। अक्सर ऐसा देखना में आता है कि इस काम में लगे हुए बच्चे ठेकेदार के परिवार के, उसके गांव के या फिर उसकी पहचान के होते हैं।
कुल मिलाकर इस इलाके में किया जाने वाला जरी का काम बाल श्रमिकों के ऊपर निर्भर है। बरेली से आने वाले बाल मजदूरों में से ज्यादातर भूमिहीन परिवारों से ताल्लुक रखते हैं। आजीविका का कोई दूसरा जरिया नहीं होने के चलते वे इस काम को करने के लिए मजबूर हैं। उत्तर प्रदेश के लखनऊ, हरदोई, शाहजहांपुर जैसे कुछ शहरों के मजदूर भी यहां यह काम करते हैं लेकिन, वे कुल मिलाकर भी 15 प्रतिशत से ज्यादा नहीं हैं।
एक बड़े ठेकेदार के यहां मोती सितारे का काम करवाने वाले असलम ने बताया कि 'यहां कोई नियम नहीं है। बीमार होने पर दवा-दारु खुद ही करना होता है। एक बाल श्रमिक दिन-रात मेहनत करने के बाद भी महीने में 3000 रुपए से ज्यादा नहीं कमा पाता है। बराबर मेहनत करने के बावजूद बड़ी उम्र के लड़कों की तुलना हमें बहुत ही कम मजदूरी मिलती है। यह सारा काम पीस रेट पर होता है, इसलिए पता नहीं होता कि अगले महीने कितनी कमाई होगी। यहां कोई यूनियन नहीं है जो हमारी बात सुने। पुलिस तो बिकी हुई है। वह ठेकेदारों से हर महीने पैसा लेती है, इसलिए हमारी बात क्यों सुनेगी।’
असलम की उम्र 14-15 साल की होगी। अभी उसके चेहरे पर रोयें आना शुरू ही हुए हैं। लेकिन, इतनी कम उम्र के बजाय वह अपने गांव में टीवी की शिकार अपनी मां, अपनी दो बहनों और एक अभी का खर्च उठाने मे अपने पिता की मदद कर रहा है। शायद यह कहावत बिल्कुल सही है कि 'गरीबों के बच्चे जल्दी सयाने हो जाते हैं।’
गार्मेंट फैक्ट्रियां यहां धागा कटिंग, बटन लगवाने और हैंड इम्ब्राडरी का काम भी करवाती हैं। जहां मोती-सितारा और सिलाई करने के काम में पुरुषों मजदूरों की संख्या ज्यादा है, वहीं इस तीसरी तरह के काम में महिलाओं की संख्या ज्यादा है। गार्मेंट फैक्ट्रियों के लिए बच्चों के साथ ही गरीब महिलाओं का शोषण करना भी आसान होता है। यह काम भी पीस रेट पर होता है। ठेकेदार को इस काम में ज्यादा फायदा नहीं होता है। इसलिए जिन्हें अड्डा वर्क या कपड़ा सिलने का काम नहीं मिलता, वही इस काम का ठेका लेते हैं। ठेकेदार मोहल्ले की महिलाओं से बेहद कम पैसे में यह काम करवाता है। आलम यह है कि यह काम करने वाली ज्यादातर महिलाएं 4-5 घंटे रोज यह काम करती हैं तब भी महीने में हजार रुपए से ज्यादा नहीं कमा पातीं हैं। इस दृष्टि से देखा जाए तो गार्मेंट इंडस्ट्री में महिलाओं और बच्चों का शोषण बालिग पुरुषों की अपेक्षा ज्यादा है।
गोविन्द पुरी, खिड़की गांव, तुगलकाबाद एक्सटेंसन आदि ऐसे इलाके हैं जहां गार्मेंट कम्पनियां अपना काम करवाती हैं। उन्होंने कपड़ा तैयार करने के अपने समूचे काम को छोटे-छोटे टुकड़े में तोड़कर मोहल्लों तक को अपनी असेम्बली लाइन से जोड़ दिया है। इससे न सिर्फ उनके मुनाफे में सैकड़ों गुना की बढ़ोत्तरी हुई है वरन उन्होंने मजदूरों के संगठन बनाने के रास्ते में भी अवरोध खड़ा कर दिया है। इसलिए आज पहले की तरह सिर्फ कारखाना केन्द्रित संगठन बनाकर काम नहीं किया जा सकता। निश्चित तौर पर पहली लड़ाई तो कारखानों से ही शुरू होगी लेकिन वह सही ढंग से तभी लड़ी जा सकती है जब संगम विहार जैसे इलाकों में भी यूनियन से जुड़ा हुआ कोई संगठन हो जो वहां के मजदूरों को कारखाना मजदूरों के साथ खड़ा करे। इसलिए आज मजदूर संगठनों या कारखाना केन्द्रित यूनियनों को अपनी पैठ उन मोहल्लों तक बनानी होगी जहां गार्मेंट कम्पनियां अपना काम करवाती हैं। अगर ऐसी कोई प्रक्रिया शुरू होती है तो निश्चित तौर पर बिखरे हुए मजदूरों के बीच एकता की नई नींव पड़ेगी।
दिनेश मोहनिया (संगम विहार)
दिनेश सामाजिक कार्यों में जुड़े रहते
हैं. छात्र जीवन के दौरान दोस्तों के साथ मिलकर उन्होंने ऐसे बच्चों को
पढ़ाने का काम शुरू किया जिनके माता-पिता काम पर चले जाते थे और उनके बच्चे
दिनभर गलियों में आवारा घूमते थे. जनलोकपाल आंदोलन में शुरू से सक्रिय रहे
और कई जिम्मेदारियां निभाई. आंदोलन के बाद पार्टी के गठन के पश्चात संगठन
निर्माण में भी विभिन्न जिम्मेदारियां निभाते रहे हैं.


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