गुरुवार, 24 दिसंबर 2009

नयका


देश में लोकप्रिय खेल क्रिकेट के सामने दूसरे खेलों को नज़रअंदाज़ किया जाता रहा है। परंपरागत और ग्रामीण अंचल के खेलों की अनदेखी से केवल खेलों को ही नहीं बल्कि युवाओं को भी नुकसान हुआ है। उनकी नेतृत्व क्षमता से लेकर सर्वांगीण विकास प्रभावित हुआ है। सरकार के नेहरू युवक केंद्र बनाने के बाद से ही ग्रामीण अंचल के खेलों और युवाओं को प्रोत्साहित करने के लिए कदम उठाए जाते रहे हैं, लेकिन ये नाकाफी ही रहे। कभी सरकारी अमले की उदासीनता से तो कभी इनके मद में जारी धनराशि में घपले की वजह से वंचित और पिछड़े वर्ग का युवा और खेल दोनों ही हाशिए पर पड़े रहे।



वंचित युवाओं और खिलाड़ियों के सर्वांगीण विकास का बीड़ा अब एक गैर सरकारी संगठन ने उठाया है। अपने एजेंडे में संस्था ने उन लोगों तक खेल और व्यक्तित्व विकास के लिए नए आयाम पहुंचाने की योजना बनाई है जो कि विकासशील भारत में इससे वंचित रह गए हैं। संस्था का नज़रिया है कि व्यक्तित्व विकास के लिए पढ़ाई-लिखाई और रहन-सहन के साथ ही खेलों में सहभागिता भी जरूरी है। खेलों के ही जरिए विश्व में हमारे ग्रामीण अंचल के खिलाड़ी अपना कीर्तिमान स्थापित कर चुके हैं। इस लिहाज से सुशील कुमार से लेकर विजेंद्र सिंह ने मिसाल कायम की है। लिहाज़ा वंचित शहरी युवा क्यों ना खेल के जरिए ही अपना उत्थान स्वंय करे।




ऐसे ही खिलाड़ियों को तैयार करने के लिए इस संस्था ने उपेक्षा के शिकार खेलों जैसे कैरम ,से शरुआत की है। ताकि वंचित समाज को खेल स्पर्धाओँ और प्रतियोगिताओं के जरिए समाज की मुख्य धारा से जोड़ा जा सके । संस्था का लक्ष्य है कि शहरी बस्तियों और झुग्गियों में छुपी प्रतिभाओं को खेलों में पारंगत बनाकर उनका संबल बने। उनके अंदर इतना आत्मविश्वास पैदा करे कि वो प्रतियोगिताओं में अपनी हिस्सेदारी दर्ज कराकर खिताबों पर कब्जा कर सकें।

संस्था के इस मिशन में उपेक्षित खेलों के जीर्णोद्धार के साथ ही इन खेलों की तरफ युवावर्ग का ध्यान आकर्षित करना है।